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लाइफस्टाइल डेस्क. भारत शुरू से ही सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश रहा है। भारत ने हर चीज को दिल खोलकर गले लगाया है, फिर वह दूर देशों से आने वाली संस्कृति हो, भाषा हो या फिर खाना ही सही। इनमें ही शामिल है पर्शियन कूजीन यानी ईरानी फूड। भारत में तंदूर ईरान की ही सौगात मानी जाती है। आज हम होटलों में शान से तंदूरी रोटी आदि खाते हैं। ऐसे ही और भी कई व्यंजन हैं जो आज भारतीय प्लेट की शान बन चुके हैं, लेकिन वे आए हैं चलकर सीधे ईरान से। ये भारत में इतने घुल-मिल गए हैं कि आज अपनी ईरानी जड़ें भूल चुके हैं। इन्हीं में से एक है गुलाब जामुन। गुलाब जामुन का नाम आते ही सबको मुंह में पानी आना लाजिमी है। शेफ हरपाल सिंह बता रहे हैं गुलाब जामुन की शुरुआत कैसे हुई…

  • आज किसी त्योहार या पार्टी-शादी के भोज की कल्पना गुलाब जामुन के बगैर नहीं की जा सकती है? लेकिन यह पकवान हमारा नहीं है, भले ही हमने इसे अपना बना लिया हो। यह ईरान से आया है। ईरान में 13वीं सदी के आसपास मैदे से बनी गोलियों को घी में डिप फ्राय कर लेते थे। फिर इन्हें शहद या शक्कर की चाशनी में डुबोकर खाया जाता था। उस समय वहां उसे ‘लुक्मत अल-क़ादी’ कहा जाता था। यही लुक्मत अल-क़ादी भारत में आकर ‘गुलाब जामुन’ बन गया।
  • अब सवाल यह है कि भारत में आकर ये गुलाब जामुन कैसे हो गया? तो इसे भी समझ लेते हैं। कुछ विद्वानों की मानें तो ‘गुलाब’ शब्द बना – ‘गुल’ और ‘आब’ से। गुल मतलब गुलाब और आब मतलब पानी। जिस समय यह भारत आया, उस समय कुछ लोग शक्कर की चाशनी को खुशबू देने के लिए उसमें गुलाब की पंखुड़ियां मिलाते थे। तो उसी से ‘गुल’ और ‘आब’ से यह गुलाब हो गया। जामुन जैसा आकार होने की वजह से यह व्यंजन कहलाने लगा ‘गुलाब जामुन’।
  • यह डिश तत्कालीन मुगल शासक शाहजहां की पसंदीदा हुआ करती थी। इसी तरह चलते-चलते बिरयानी की भी बात कर लेते हैं। यह भी भारतीय डिश कतई नहीं है। यह उस समय प्रचलन में आई, जब पर्शियन सेना इधर-उधर क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए जाने लगी। इस दौरान पर्शियन सेना के लिए सही ढंग का खाना और वह भी पोषण से भरपूर, बड़ी मुश्किल से नसीब हो पाता था। ऐसे में पर्शियन आर्मी के कमांडरों ने ऐसी डिश ईजाद कर दी जिसमें एक ही बर्तन में चावल, मीट और मसाले डालकर पकाया जा सकता था। इसे उन्होंने नाम दिया ‘बिरिएन’। यही डिश में बाद में ईरान के कब्जे वालों हिस्सों से भारत आ गई। नाम हो गया बिरयानी।

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