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हेल्थ डेस्क. हाल ही में इंदौर में करीब 110 करोड़ की फेंटानिल ड्रग पकड़ी गई। इसकी 0.001 ग्राम मात्रा नशे के लिए ली जाती है। यह मात्रा 0.002 होते ही यह यूजर की जान ले लेती है। दरअसल ड्रग दो प्रकार के होते हैं ब्लैक और व्हाइट। इनमें व्हाइट ड्रग सबसे ज्यादा सेंसेटिव होती है। ज्यादातर हुक्का लाउंज में युवाओं काे इसी ड्रग का चस्का लगाया जा रहा है। लगातार कार्रवाई के बाद भी मामलों में बढ़ाेतरी हो रही है। हमीदिया अस्पताल के फॉर्मोकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एके श्रीवास्तव के मुताबिक केमिकल ड्रग शारीरिक और मानसिक तौर पर खोखला कर देता है। यह किडनी-लीवर को डैमेज करने के साथ सोचने-समझने की क्षमता खत्म करता है।एक्सपर्ट बता रहे हैं ड्रग और इसके खतरों के बारे में…

    • ब्लैक ड्रग यानी ओपियम (अफीम) से बनी ड्रग। स्मैक, ब्राउन शुगर और गांजा जैसे नशे ब्लैक ड्रग में शुमार हैं। छोटे-छोटे घरों में आसानी से मिलने वाले 3-4 तरह के कैमिकल मिलाकर इसे तैयार कर लिया जाता है। सबसे ज्यादा ब्लैक ड्रग की खपत होती है।
    • कैमिकल से बनी ड्रग्स व्हाइट ड्रग में शुमार है। यह हाई सेंसेटिव ड्रग है। महंगी होने से इसके यूजर्स हाई सोसायटी के लोग हैं। शहर में इसकी खपत ब्लैक ड्रग के मुकाबले आधी भी नहीं है, लेकिन इसका कारोबार बड़ा है। चरस, कोकीन और एमडीएमए (एस्टेसी) व्हाइट ड्रग के प्रकार हैं।

    एम-कैट और एमडीएमए का आदी बनाकर यंगस्टर्स से ही इसे बिकवाया जा रहा है। हुक्का लाउंज-बार में ये सौदे किए जा रहे हैं। सरगना तक पहुंचने की हमारी कोशिशें जारी हैं।

    साईं कृष्णा, एआईजी, एसटीएफ

  1. एमडीएमए और एम-कैट साइकोट्रोपिक ड्रग होती है। इसे लेने वाले को यूफोरिया (परमानंद का अनुभव) होता है। ऐसा महसूस होता है कि आत्मविश्वास बढ़ गया है। जब ये नशा उतरता है तो दिमाग उसी तीव्र उत्तेजना को दोबारा पाना चाहता है जो पहले नशे में महसूस हुई थी। इसे क्रेविंग (प्रबल इच्छा) कहते हैं। इसलिए व्यक्ति दोबारा वही नशा करता है और इसका आदी बनता चला जाता है। इन ड्रग्स में कैमिकल कंपोनेंट होते हैं इसलिए ये तीव्र असर करती हैं। इस ड्रग के आदी हो चुके लोगों को ये धीरे-धीरे शारीरिक-मानसिक रूप से खोखला कर देती है। ये कुछ वक्त के लिए उत्तेजना भले ही बढ़ाती हो, लेकिन परफॉर्मेंस घटाती चली जाती है।

    डॉ. एके श्रीवास्तव, प्रोफेसर फॉर्मोकोलॉजी और अधीक्षक हमीदिया अस्पताल,भोपाल

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